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स्वस्थ थाली, सशक्त राष्ट्र: कुपोषण की दोहरी चुनौती और जन आंदोलन की जरूरत

आर्थिक विकास और बुनियादी ढांचे से परे, किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति उसके नागरिकों के स्वास्थ्य, पोषण और जीवन की गुणवत्ता में निहित है।

 

 

राष्ट्रीय पोषण सप्ताह (1 से 7 सितंबर) हमें यह याद दिलाने का अवसर देता है कि पोषण केवल एक स्वास्थ्य संबंधी मुद्दा नहीं, बल्कि यह मानव संसाधन विकास, सामाजिक न्याय और देश की आर्थिक प्रगति की आधारशिला है। स्वस्थ और पोषित आबादी ही एक समृद्ध और विकसित भारत का निर्माण कर सकती है।

कुपोषण का दोहरा संकट: 'छिपी भूख' से मोटापे तक

भारत आज खाद्य उत्पादन में आत्मनिर्भर है, लेकिन कुपोषण की चुनौती अब अधिक जटिल और दोहरी हो चुकी है:

अल्पपोषण एवं 'छिपी भूख' (Hidden Hunger): बच्चों में स्टंटिंग (नाटापन), वेस्टिंग (दुबलापन) और कम वजन की समस्या बनी हुई है। पर्याप्त भोजन मिलने के बावजूद शरीर में आयरन, कैल्शियम, जिंक और विटामिन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी व्यक्ति को अस्वस्थ बना देती है।

एनीमिया की गंभीर चुनौती: महिलाओं, गर्भवती माताओं और किशोरियों में आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया कार्यक्षमता, शारीरिक विकास और आने वाली पीढ़ी के स्वास्थ्य को सीधे प्रभावित कर रहा है।

शहरी कुपोषण व गैर-संचारी रोग: बदलती जीवनशैली, शारीरिक गतिविधियों की कमी, लंबे समय तक स्क्रीन टाइम और अत्यधिक प्रसंस्कृत (Packaged/Junk Food) भोजन के कारण मोटापा, मधुमेह (Diabetes) और उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं।

जीवन के प्रथम 1,000 दिन और मातृ पोषण

कुपोषण से लड़ाई की शुरुआत बच्चे के जन्म के बाद नहीं, बल्कि गर्भावस्था से ही होनी चाहिए।

 

किशोरी व मातृ पोषण: एक स्वस्थ माँ ही स्वस्थ शिशु को जन्म दे सकती है। किशोरियों और महिलाओं के पोषण को प्राथमिकता देना अगली पीढ़ी के स्वास्थ्य में सबसे बड़ा निवेश है।

शुरुआती 1,000 दिन: गर्भावस्था से लेकर बच्चे के 2 साल के होने तक का समय उसके शारीरिक और मानसिक विकास की नींव तय करता है।

स्थानीय व पारंपरिक आहार में समाधान

पौष्टिक भोजन का अर्थ महंगे खाद्य पदार्थ नहीं हैं। भारत की पारंपरिक खाद्य संस्कृति में ही इसका समाधान मौजूद है:

श्रीअन्न (मोटे अनाज) व दालें: बाजरा, रागी, ज्वार और विविधतापूर्ण दालें प्रोटीन व खनिजों का सबसे सुलभ स्रोत हैं।

मौसमी व स्थानीय फल-सब्जियां: स्थानीय स्तर पर उपलब्ध हरी पत्तेदार सब्जियां और फल कम लागत में संपूर्ण पोषण प्रदान करते हैं।

स्वच्छता का संबंध: दूषित पानी और अस्वच्छ वातावरण से होने वाले संक्रमण शरीर के पोषक तत्वों को नष्ट कर देते हैं। इसलिए स्वच्छ पेयजल और शौचालय भी पोषण नीति का अभिन्न अंग हैं।

नीतिगत पहल, तकनीक और आंगनबाड़ी की भूमिका

सरकार द्वारा संचालित पोषण अभियान और 'मिशन सक्षम आंगनवाड़ी एवं पोषण 2.0' इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं:

डिजिटल निगरानी (POSHAN Tracker): तकनीक के माध्यम से लाभार्थियों और आंगनबाड़ी सेवाओं की वास्तविक समय पर ट्रैकिंग की जा रही है, जिससे डेटा-आधारित फैसले लेने में मदद मिलती है।

आंगनबाड़ी कार्यकर्ता: जमीनी स्तर पर बच्चों के वजन की निगरानी, माताओं को परामर्श और व्यवहार परिवर्तन में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता सबसे मजबूत कड़ी हैं।

स्कूलों की भूमिका: स्कूलों में केवल किताबों तक सीमित न रखकर व्यावहारिक पोषण शिक्षा और स्वस्थ खान-पान को दिनचर्या का हिस्सा बनाना जरूरी है।

आगे की राह: पोषण को 'जन आंदोलन' बनाना

कुपोषण को केवल सरकारी योजनाओं से समाप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए इसे एक व्यापक सामाजिक आंदोलन (Jan Andolan) बनाना होगा:

जीवन-चक्र आधारित रणनीति: हर आयु वर्ग (शिशु, किशोरी, गर्भवती महिला, युवा व बुजुर्ग) की विशिष्ट पोषण आवश्यकताओं के अनुसार नीतियां बनाई जाएं।

क्षेत्रीय असमानता दूर करना: विभिन्न राज्यों और जिलों की स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रखते हुए लक्षित योजनाएं लागू हों।

जलवायु परिवर्तन का मुकाबला: अनियमित मौसम और बाढ़-सूखे से खाद्य फसलों पर पड़ने वाले प्रभाव से निपटने के लिए टिकाऊ कृषि और स्थानीय विविधता को बढ़ावा दिया जाए।

केवल पेट भरना पोषण नहीं है; सही मात्रा, सही गुणवत्ता और विविधतायुक्त थाली ही स्वस्थ समाज और मजबूत भारत की वास्तविक नींव है।

 

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