2050 तक 73 लाख जिंदगियां बचाने और विकासशील देशों को $135 अरब का आर्थिक संबल देने का वादा; जानिए कैसे 2029 से शुरू होने वाला यह नया अध्याय दुनिया को एक घातक बीमारी से मुक्ति दिला सकता है।
करोड़ों जिंदगियों पर मंडराता सदियों पुराना साया
तपेदिक (टीबी) आज भी दुनिया की सबसे जानलेवा संक्रामक बीमारियों में से एक बनी हुई है, जिसका सबसे भयावह असर निम्न और मध्यम आय वाले देशों पर पड़ रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, वर्ष 2024 में वैश्विक स्तर पर करीब 1.07 करोड़ लोग टीबी की चपेट में आए और 12.3 लाख लोगों ने अपनी जान गंवाई। इससे पहले 2023 में 1.08 करोड़ लोग संक्रमित हुए थे, जिनमें 60 लाख पुरुष, 36 लाख महिलाएं और 13 लाख बच्चे शामिल थे।
ग्लोबल ट्यूबरक्लोसिस रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के एक-चौथाई से अधिक टीबी के मामले अकेले भारत में दर्ज किए जाते हैं। इस विशाल संकट के बावजूद, हमारे पास बचाव का एकमात्र जरिया करीब एक सदी पुराना 'बैसिलस कैलमेट-गुएरिन' (बीसीजी) टीका है। बीसीजी शिशुओं को गंभीर टीबी से तो बचाता है, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ इसका असर कम होने लगता है। यही वजह है कि किशोरों और वयस्कों के लिए एक नई और प्रभावी वैक्सीन की सख्त जरूरत बनी हुई थी।
2029 से नई शुरुआत: 73 लाख जिंदगियों और $135 अरब की उम्मीद
अंतरराष्ट्रीय वैक्सीन गठबंधन ('गावी') के नवीनतम विश्लेषण ने टीबी के खिलाफ इस लड़ाई में एक नई उम्मीद जगाई है। 2029 से उपलब्ध होने वाली नई पीढ़ी की टीबी वैक्सीन 2030 से 2050 के बीच 73 लाख जिंदगियां बचा सकती है।
यह सिर्फ एक चिकित्सीय सफलता नहीं है, बल्कि एक आर्थिक क्रांति भी है। इन टीकों के उपयोग से 2050 तक निम्न और मध्यम आय वाले देशों को 13,500 करोड़ डॉलर ($135 Billion) का सीधा आर्थिक लाभ होगा। टीबी केवल इंसान की सेहत नहीं छीनती, बल्कि घर की आय, बच्चों की पढ़ाई और पूरे परिवार की वित्तीय स्थिरता को नष्ट कर देती है। नई वैक्सीन लाखों परिवारों को गरीबी के इस दुष्चक्र से बाहर निकालने का संबल बनेगी।
बीसीजी के आगे: किशोरों और वयस्कों के लिए सुरक्षा कवच
नई पीढ़ी की यह वैक्सीन मुख्य रूप से किशोरों और वयस्कों में संक्रामक फेफड़ों (पल्मोनरी) की टीबी को रोकने के लिए तैयार की जा रही है। चूंकि यही आयु वर्ग टीबी के प्रसार का मुख्य जरिया बनता है, इसलिए इन्हें सुरक्षित करना वैश्विक महामारी की कड़ी को तोड़ने में निर्णायक साबित होगा।
"यह नई टीबी वैक्सीन टीकाकरण के क्षेत्र का अगला 'ब्लॉकबस्टर' हथियार बन सकती है। लेकिन इसकी वास्तविक क्षमता तभी उजागर होगी, जब सबसे ज्यादा प्रभावित देशों को इसकी पर्याप्त, भरोसेमंद और किफायती आपूर्ति मिल सके।"
— डॉ. सानिया निश्तर, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, गावी
भविष्य की जरूरतें और वैश्विक चुनौतियां
गावी के अनुमानों के अनुसार, निम्न और मध्यम आय वाले देशों में इन टीकों की मांग औसतन 8.6 करोड़ खुराक (वैक्सीन कोर्स) प्रति वर्ष तक पहुंच सकती है। शुरुआती सालों में यह मांग और भी ज्यादा हो सकती है। हालांकि, इस उम्मीद को हकीकत में बदलने के लिए दुनिया के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं:
आपूर्ति और निर्माण: यदि मांग को लेकर अनिश्चितता रही, तो निर्माता उत्पादन क्षमता में निवेश करने से हिचकिचा सकते हैं।
वित्तीय संसाधन: अंतरराष्ट्रीय और घरेलू स्तर पर पर्याप्त बजट न मिलने से कई देश इसे अपने राष्ट्रीय टीकाकरण अभियानों में शामिल नहीं कर पाएंगे।
समान पहुंच: तकनीक का सफल होना एक पहलू है, लेकिन इसे अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है।
गावी ने इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए तीन प्रमुख प्राथमिकताएं तय की हैं:
सस्ती और निर्बाध आपूर्ति: टीकों का समय पर, पर्याप्त और किफायती दरों पर उत्पादन सुनिश्चित करना।
व्यापक कवरेज: नियमित टीकाकरण और लक्षित अभियानों के जरिए ज्यादा से ज्यादा लोगों को कवर करना।
मजबूत बाजार ढांचा: विभिन्न देशों की जरूरतों के अनुसार कई निर्माताओं और वैक्सीन विकल्पों वाला एक टिकाऊ बाजार तैयार करना।
तैयारी का समय: आज ही उठाना होगा कदम
टीबी के आंकड़े अक्सर केवल फाइलों और रिपोर्टों में दर्ज होकर रह जाते हैं, लेकिन हर एक आंकड़े के पीछे एक टूटता हुआ परिवार होता है—इलाज में बहती जमापूंजी, छूटती पढ़ाई और अनिश्चित भविष्य। इसीलिए 73 लाख बचाई जाने वाली जिंदगियों का मतलब केवल एक संख्या नहीं, बल्कि लाखों घरों की खुशहाली है।
भले ही 2029 आने में अभी कुछ वर्ष बाकी हैं, लेकिन वैश्विक स्वास्थ्य संगठनों, सरकारों और निर्माताओं को आज से ही इसका इंफ्रास्ट्रक्चर और फंडिंग मॉडल तैयार करना होगा। विज्ञान ने हमें एक नया रास्ता दिखाया है; अब यह दुनिया की साझा जिम्मेदारी है कि वह इस उम्मीद को समय रहते हर जरूरतमंद तक पहुंचाए।