केमिकल इंजीनियरिंग पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, स्वच्छ ऊर्जा के भविष्य के लिए तकनीकी प्रगति के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक संतुलन बनाना अनिवार्य।
दुनिया भर में गहराते ऊर्जा संकट और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच 'ग्रीन हाइड्रोजन' को भविष्य के सबसे आशाजनक और टिकाऊ ऊर्जा स्रोत के रूप में देखा जा रहा है। उद्योग, भारी परिवहन और ऊर्जा उत्पादन जैसे विविध क्षेत्रों में इसका उपयोग वैश्विक अर्थव्यवस्था को कार्बन-मुक्त बनाने की क्षमता रखता है। वर्ष 2024 में वैश्विक स्तर पर हाइड्रोजन की मांग 10 करोड़ टन तक पहुँच गई, जो पिछले एक दशक की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत अधिक है।
हालाँकि, इस अपार क्षमता के बावजूद वर्तमान में कम उत्सर्जन वाले (ग्रीन) हाइड्रोजन की हिस्सेदारी कुल उत्पादन में 1 प्रतिशत से भी कम है। केमिकल इंजीनियरिंग पत्रिका में प्रकाशित एक नवीन शोध के अनुसार, ग्रीन हाइड्रोजन के वैश्विक विस्तार के मार्ग में केवल तकनीकी ही नहीं, बल्कि कई सामाजिक और आर्थिक चुनौतियाँ भी मौजूद हैं।
ग्रीन हाइड्रोजन का निर्माण अक्षय ऊर्जा (सौर, पवन आदि) के उपयोग से जल के विद्युत-अपघटन (इलेक्ट्रोलीसिस) द्वारा किया जाता है, जिसमें कार्बन उत्सर्जन न के बराबर होता है। लेकिन इसके सामने सबसे बड़ी चुनौती इसका भंडारण और अंतरमहाद्वीपीय परिवहन है।
अत्यंत हल्की गैस होने के कारण सामान्य परिस्थितियों में यह बहुत अधिक स्थान घेरती है।
इसे अत्यधिक उच्च दबाव या अति-शीतलीकृत (क्रायोजेनिक) द्रव के रूप में ही दूरस्थ स्थानों तक भेजा जा सकता है, जो कि अत्यंत जोखिम भरा और खर्चीला है।
इस परिवहन समस्या के समाधान के रूप में LOHC तकनीक एक क्रांतिकारी विकल्प बनकर उभरी है:
रासायनिक संयोजन: इसमें हाइड्रोजन को एक विशेष जैविक तरल पदार्थ (ऑर्गेनिक लिक्विड) के साथ रासायनिक क्रिया कराकर जोड़ा जाता है।
आसान परिवहन: यह तरल पदार्थ सामान्य खनिज तेल की तरह ही सुरक्षित रूप से संग्रहीत और मौजूदा अवसंरचना द्वारा स्थानांतरित किया जा सकता है।
पुनर्चक्रण: गंतव्य पर पहुँचकर एक अन्य रासायनिक प्रक्रिया के माध्यम से हाइड्रोजन को पुनः अलग कर लिया जाता है, तथा वाहक तरल को दोबारा इस्तेमाल के लिए वापस भेज दिया जाता है।
बास्क देश विश्वविद्यालय (EHU) की 'सुप्रेन' (SUPREN) शोध टीम द्वारा UnLOHCKed नामक यूरोपीय परियोजना के तहत बड़े पैमाने पर ग्रीन हाइड्रोजन आपूर्ति श्रृंखला का अध्ययन किया जा रहा है। शोधकर्ताओं ने प्रमुख उत्पादक देशों (जैसे नामीबिया, सऊदी अरब, नॉर्वे, स्पेन) और संभावित उपभोक्ता देशों (जैसे जर्मनी, नीदरलैंड, जापान, इटली) के बीच हाइड्रोजन परिवहन के विभिन्न मॉडलों का गहन विश्लेषण किया।
कोई एक सार्वभौमिक मॉडल नहीं: अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए कोई एक ऐसा 'आदर्श मॉडल' नहीं है जो हर परिस्थिति में सर्वश्रेष्ठ हो। जिस व्यवस्था में लागत कम है, उसमें सामाजिक या राजनीतिक जोखिम अधिक हो सकते हैं।
त्रिआयामी संतुलन की आवश्यकता: भविष्य के हाइड्रोजन व्यापार का निर्धारण केवल आर्थिक लाभ (मुनाफ़े) के आधार पर नहीं, बल्कि पर्यावरण, समाज और अर्थव्यवस्था तीनों के संतुलन को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
ऊर्जा दक्षता में सुधार आवश्यक: ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन और LOHC से हाइड्रोजन को वापस निकालने (डिहाइड्रोजनैशन) की प्रक्रिया में बहुत अधिक ऊर्जा खर्च होती है। इन प्रक्रियाओं की दक्षता (Efficiency) बढ़ाना वैज्ञानिकों के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है।
ग्रीन हाइड्रोजन का बढ़ता बाज़ार दुनिया के मौजूदा ऊर्जा व्यापार के मानचित्र को पूरी तरह बदल सकता है:
| श्रेणी | संभावित क्षेत्र / देश |
|---|---|
| प्रमुख उत्पादक केंद्र | प्रचुर अक्षय ऊर्जा वाले क्षेत्र: अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, मध्य पूर्व और ओशिनिया |
| प्रमुख आयातक क्षेत्र | उच्च ऊर्जा मांग वाले विकसित क्षेत्र: यूरोप, जापान, दक्षिण कोरिया |
ग्रीन हाइड्रोजन और LOHC तकनीक निस्संदेह वैश्विक ऊर्जा संकट के निवारण में मील का पत्थर साबित हो सकती हैं। हालाँकि, एक टिकाऊ और न्यायसंगत 'हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था' का निर्माण केवल कार्बन उत्सर्जन और लागत कम करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि उत्पादन करने वाले विकासशील देशों और स्थानीय समुदायों के सामाजिक-आर्थिक हितों की रक्षा हो। तकनीक, पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और सामाजिक जिम्मेदारी का यही समन्वय भविष्य की ऊर्जा क्रांति को सफल बनाएगा।