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ग्रामीण क्षेत्रों के शहरीकरण को प्रोत्साहन: 16वें वित्त आयोग की सिफारिशें और नीतिगत बहस

2026-30 की अवधि के लिए 10,000 करोड़ रुपए के ‘शहरीकरण प्रोत्साहन’ कोष का प्रस्ताव—आर्थिक विकास की गति बनाम ग्रामीण पंचायतों की चिंताएं और विशेषज्ञों का दृष्टिकोण।

 

 

16वें वित्त आयोग ने देश में आर्थिक विकास को रफ्तार देने और नियोजित विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से अधिक परि-शहरी (Peri-urban) और ग्रामीण क्षेत्रों को शहरी निकायों के दायरे में लाने के लिए प्रोत्साहन देने की सिफारिश की है। इसके तहत आयोग ने वर्ष 2026 से 2030 की अवधि के लिए 10,000 करोड़ रुपए के ‘शहरीकरण प्रोत्साहन’ (Urbanisation Incentive) का प्रावधान किया है।

इस पहल के अंतर्गत, उपनगरीय गांवों को कम से कम 1 लाख की आबादी वाले निकटवर्ती बड़े शहरी निकायों में शामिल करने वाले राज्यों को 2011 की जनगणना के आधार पर प्रति व्यक्ति 2,000 रुपए की एकमुश्त पात्रता राशि दी जाएगी। शर्त यह होगी कि राज्यों को इन क्षेत्रों को ग्रामीण से शहरी स्वरूप में परिवर्तित करने के लिए उपयुक्त नीतियां तैयार करनी होंगी।

1. वित्त आयोग का तर्क: उत्पादकता और नियोजित विकास

वित्त आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, शहरीकरण आर्थिक समृद्धि और उत्पादकता बढ़ाने का एक प्रमुख जरिया है। शहरों में भौतिक व मानव संसाधन, अवसंरचना, आर्थिक गतिविधियां और रोजगार के अवसर एक ही स्थान पर केंद्रित होते हैं।

कार्यबल और मूल्य संवर्धन (Value Addition) में असमानता:

वर्ष 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार, देश का 46 प्रतिशत कार्यबल कृषि क्षेत्र में लगा हुआ है, जबकि कुल मूल्य संवर्धन (GVA) में कृषि का योगदान केवल 17.8 प्रतिशत है।

इसके विपरीत, उद्योग और सेवा क्षेत्रों में प्रति श्रमिक औसत मूल्य संवर्धन, कृषि क्षेत्र की तुलना में लगभग 3.9 गुना अधिक है।

इसलिए, यदि श्रमिक कृषि से निकलकर शहरी क्षेत्रों के उद्योग और सेवा क्षेत्रों में स्थानांतरित होते हैं, तो कुल प्रति श्रमिक उत्पादकता में भारी वृद्धि की संभावना है।

अव्यवस्थित विकास पर रोक: आयोग ने दो मुख्य बिंदुओं पर बल दिया है—शहरों में समुचित जल-निकासी (Drainage) व्यवस्था और व्यवहार में शहरी हो चुके ग्रामीण क्षेत्रों को समय पर शहरी निकाय का कानूनी दर्जा देना। इसमें देरी से अनियोजित बस्तियों का निर्माण होता है और बुनियादी ढांचा कमजोर रह जाता है।

2. ग्रामीण पंचायतों का विरोध और चिंताएं

वित्त आयोग की यह सिफारिशें ऐसे समय में आई हैं जब कई राज्यों में ग्रामीण पंचायतें शहरी निकायों में शामिल किए जाने का विरोध कर रही हैं।

ग्रामीण योजनाओं से वंचना: पंचायतों का तर्क है कि शहरी दायरे में आते ही वे ग्रामीण विकास के लिए मिलने वाली विशेष योजनाओं (जैसे मनरेगा, ग्रामीण आवास योजनाएं आदि) और रियायतों से वंचित हो जाती हैं।

कर और लागत में वृद्धि: शहरी निकाय बनने के बाद करों की दरें बढ़ जाती हैं, जबकि बुनियादी सुविधाएं तत्काल उपलब्ध नहीं हो पातीं।

3. विशेषज्ञों की राय और नीतिगत दृष्टिकोण

शहरीकरण के इस प्रोत्साहन मॉडल पर विषय विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं के भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण सामने आए हैं:

I. स्वागतयोग्य कदम (आईआईपीए दृष्टिकोण)

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन (IIPA), दिल्ली के प्रोफेसर वी. एन. आलोक के अनुसार, शहरीकरण को बढ़ावा देना और प्रवासी आबादी की अनियोजित बस्तियों की समस्या से निपटना एक समयोचित और स्वागतयोग्य कदम है। हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल के राज्य वित्त आयोगों की रिपोर्टों में भी इस विषय पर पहले विस्तार से चर्चा की जा चुकी है।

II. 'भीतर की ओर विकास' का मॉडल

पूर्व केंद्रीय पंचायती राज सचिव एस. एम. विजयानंद का मानना है कि केवल गांवों को शहरों में मिलाना पूरी तरह सही दृष्टिकोण नहीं है। इसके बजाय, परि-शहरी (Peri-urban) क्षेत्रों का विकास 'भीतर की ओर' (Inward Development) किया जाना चाहिए, ताकि लोगों को बुनियादी सुविधाओं के लिए शहरों की ओर न भागना पड़े और बड़े शहरों पर अतिरिक्त दबाव न बढ़े।

III. संसाधनों के संतुलन की आवश्यकता

गैर-लाभकारी संस्था 'प्रदान' (PRADAN) के कार्यकारी निदेशक सरोज कुमार महापात्र का कहना है कि शहरीकरण प्रोत्साहन के कारण कृषि प्रधान और दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों से ध्यान या संसाधन अनजाने में नहीं हटने चाहिए। ये क्षेत्र आज भी जल सुरक्षा और आजीविका जैसे संकटों से जूझ रहे हैं। शहरीकरण की रूपरेखा ऐसी होनी चाहिए जो ग्रामीण विकास में हो रहे मूल निवेश की पूरक बने, न कि उसकी प्रतिस्पर्धी।

निष्कर्ष

16वें वित्त आयोग की सिफारिशें भारत को एक सुव्यवस्थित शहरीकृत अर्थव्यवस्था बनाने की दिशा में बड़ा कदम हैं। हालांकि, इस नीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्य सरकारें ग्रामीण पंचायतों की चिंताओं का समाधान कैसे करती हैं और यह सुनिश्चित कैसे करती हैं कि शहरीकरण का यह प्रोत्साहन मॉडल ग्रामीण आजीविका और कृषि अर्थव्यवस्था की बलि चढ़ाए बिना लागू किया जाए।

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