ग्लोबल वार्मिंग का नया प्रहार: जानिए कैसे गर्म होती धरती दूर-दराज़ के मौसम को जोड़ने वाले 'मानसून-डेजर्ट मैकेनिज्म' को मिटा रही है।
दक्षिण एशिया में हर साल सक्रिय होने वाला मानसूनी मौसम केवल भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों तक सीमित नहीं है। यह प्रकृति के उन विशाल और अदृश्य हवा के पैटर्न का हिस्सा है, जिसका सीधा असर हजारों किलोमीटर दूर स्थित भूमध्यसागर (Mediterranean) के गर्मियों के मौसम पर भी पड़ता है।
हालांकि, वैज्ञानिक शोधों से एक चिंताजनक बात सामने आई है: जलवायु परिवर्तन और बढ़ते वैश्विक तापमान (Global Warming) के कारण सदियों से बना यह जलवायु संबंध कमजोर हो रहा है और इस सदी के दूसरे हिस्से (21st Century's Second Half) तक लगभग समाप्त हो सकता है।
मानसून-डेजर्ट मैकेनिज्म: दक्षिण एशियाई मानसून और भूमध्यसागरीय हवा का संबंध.
मौसम विज्ञान में दक्षिण एशिया और भूमध्यसागर के बीच के इस रिश्ते को 'मानसून-डेजर्ट मैकेनिज्म' कहा जाता है।
गर्म हवा का उठना: गर्मियों के महीनों में जब दक्षिण एशिया के ऊपर मानसूनी गतिविधियां तेज होती हैं, तब भारी मात्रा में गर्म और नम हवा वायुमंडल में काफी ऊंचाई तक उठती है।
गर्मी का संचरण: यह प्रक्रिया वायुमंडल में बड़े पैमाने पर उष्मा (Heat) छोड़ती है, जो हवा के वैश्विक प्रवाह को प्रभावित करती है।
भूमध्यसागर पर प्रभाव: इसका परिणाम यह होता है कि भूमध्यसागर के ऊपर हवा नीचे की ओर उतरने (Subsidence) लगती है। हवा के नीचे उतरने से वहां बादल नहीं बन पाते और बारिश की संभावना काफी घट जाती है।
यही वजह है कि दक्षिण एशिया में जब मानसून चरम पर होता है, तब भूमध्यसागरीय क्षेत्रों में गर्म, शुष्क और सूखा मौसम बना रहता है।
चीन के इंसटीट्यूट ऑफ एटमॉस्फेरिक फिजिक्स से जुड़े प्रोफेसर तियानजुन झोउ (Tianjun Zhou) के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन के परिणाम प्रतिष्ठित पत्रिका 'नेचर जियोसाइंस' (Nature Geoscience) में प्रकाशित हुए हैं।
शोधकर्ताओं ने भविष्य के उच्च-उत्सर्जन (High-Emission) परिदृश्यों को समझने के लिए दर्जनों वैश्विक जलवायु मॉडल सिमुलेशन और वैज्ञानिक प्रयोगों का अध्ययन किया:
97.5% सिमुलेशन का निष्कर्ष: CESM1 (Community Earth System Model 1) जलवायु मॉडल के 97.5% परीक्षणों में यह पाया गया कि भविष्य में एशियाई मानसून का भूमध्यसागर पर पड़ने वाला प्रभाव तेजी से घटेगा।
प्रभाव का स्तर: वर्तमान में भूमध्यसागर में बारिश के साल-दर-साल बदलाव में दक्षिण एशियाई मानसून का योगदान करीब 14.2% रहता है, जो भविष्य में घटकर महज 5.1% रह जाएगा।
शोधकर्ताओं ने इसके पीछे दो प्रमुख कारण बताए हैं:
ग्लोबल वार्मिंग के चलते मानसून के दौरान संवहन (Convection) पहले से अधिक तीव्र और ऊंचा हो रहा है।
CESM1 मॉडल के अनुसार, मानसून संवहन का दबाव स्तर 452 हेक्टोपास्कल (hPa) से बढ़कर 417 hPa तक ऊपर चला जाएगा।
हवा के अधिक ऊंचाई पर उठने से मानसून से उत्पन्न गर्मी का प्रभाव और अधिक पश्चिम की ओर फैल जाता है। इससे भूमध्यसागर के पूर्व और पश्चिम के बीच तापमान का अंतर घट जाता है और नीचे उतरने वाली हवा कमजोर पड़ने लगती है।
दूसरा बदलाव भूमध्यसागर के अपने वायुमंडल में हो रहा है। मानसून के कारण ऊपरी वायुमंडल में हवा का नीचे उतरना घटता है, जिससे निचले वायुमंडल में उत्तर दिशा से आने वाली हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। इसे वैज्ञानिक 'स्वेरड्रप बैलेंस' (Sverdrup Balance) के फीडबैक प्रभाव से जोड़ते हैं, जो मानसून के असर को और ज्यादा निष्प्रभावी कर देता है।
मौसम विज्ञान में दुनिया के दूर-दराज हिस्सों के बीच के इस तरह के वायुमंडलीय संबंधों को 'टेली-कनेक्शन' (Teleconnections) कहा जाता है।
"वैश्विक तापमान वृद्धि केवल औसत तापमान या बारिश के आंकड़ों को नहीं बदलती, बल्कि यह जलवायु प्रणाली के दूर-दराज क्षेत्रों को आपस में जोड़ने वाले गतिकीय रिश्तों को भी पुनर्गठित कर देती है।"
— प्रोफेसर तियानजुन झोउ, प्रमुख शोधकर्ता
पूर्वानुमान लगाना कठिन होगा: जब जलवायु की यह अदृश्य कड़ियां कमजोर होंगी, तो मौसम के पुराने और स्थापित पैटर्न बदल जाएंगे।
मौसम का बदलता दायरा: भूमध्यसागर में गर्मियों के दौरान होने वाली बारिश को समझने के लिए केवल एशियाई मानसून पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा, अन्य स्थानीय व वैश्विक कारक अधिक हावी हो जाएंगे।
जलवायु परिवर्तन केवल धरती को गर्म नहीं कर रहा, बल्कि दुनिया के मौसम को एक सूत्र में पिरोने वाले कुदरती संजाल को भी कमजोर कर रहा है।
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