शरीर पर राम-नाम का टैटू, सफेद वस्त्र और मूर्ति पूजा से परे निर्गुण भक्ति — जानिए 130 साल पुरानी इस अनूठी परंपरा के बारे में
"जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी..." — गोस्वामी तुलसीदास जी की ये पंक्तियां भक्ति के विविध रूपों को दर्शाती हैं। छत्तीसगढ़ में एक ऐसा ही अनूठा समुदाय निवास करता है, जिसने ईश्वर की भक्ति का एक बेहद अनोखा और विरला मार्ग चुना है। हम बात कर रहे हैं रामनामी समुदाय की, जिनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य और आधार केवल और केवल 'राम नाम' है।
छत्तीसगढ़ में महानदी के तटीय क्षेत्रों में बसने वाले रामनामी समुदाय के लोगों के दिन की शुरुआत और अंत राम का नाम लेकर ही होता है।
शरीर पर राम-नाम (टैटू): इस समाज के लोग अपने पूरे शरीर पर नीली स्याही से 'राम-राम' गुदवाते (टैटू) हैं।
पहनावा व घर: ये श्वेत वस्त्र धारण करते हैं, जिन पर हर तरफ 'राम' नाम छपा होता है। इतना ही नहीं, इनके घरों की दीवारों और रोजमर्रा के सामानों पर भी प्रभु राम का नाम लिखा होता है।
भक्ति का रूप: यह समुदाय मूर्ति पूजा के बजाय निर्गुण भक्ति और राम नाम के निरंतर स्मरण को ही मोक्ष और सत्य का मार्ग मानता है।
रामनामी समाज की यह परंपरा सदियों पुरानी न होकर लगभग 130 साल पूर्व (वर्ष 1890) शुरू हुई थी।
संस्थापक: इसकी शुरुआत युवक परशुराम ने की थी। उन्होंने सर्वव्यापी निर्गुण भक्ति का मार्ग चुना और संदेश दिया कि राम किसी मूर्ति या मंदिर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे कण-कण और स्मरण में विराजमान हैं।
वर्तमान फैलाव: वर्तमान समय में इस समाज के बहुसंख्यक लोग मुख्य रूप से राज्य के सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के बिलाईगढ़ क्षेत्र और उसके आसपास के गांवों में निवास करते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, त्रेतायुग में 'दक्षिण कौशल' के नाम से जाना जाने वाला छत्तीसगढ़ भगवान श्रीराम का ननिहाल है।
माता कौशल्या का जन्म छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले के चंदखुरी गांव में हुआ था।
चंदखुरी में माता कौशल्या को समर्पित दुनिया का इकलौता मंदिर स्थित है, जो इस क्षेत्र की श्रीराम के प्रति अगाध श्रद्धा का मुख्य केंद्र है।
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