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सिर्फ भोजन नहीं, भविष्य बर्बाद कर रहे हैं हम! जानिए खाने की बर्बादी कैसे बढ़ा रही है जलवायु संकट

हर दिन एक अरब टन से ज्यादा खाना फेंकना सिर्फ संसाधनों की बर्बादी नहीं, बल्कि धरती के तापमान को तेजी से बढ़ाने का एक बड़ा कारण बन रहा है।

 

आज के दौर में खाने की बर्बादी केवल भूख, गरीबी या अर्थव्यवस्था से जुड़ी समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह सीधे तौर पर हमारे ग्रह के अस्तित्व यानी जलवायु परिवर्तन से जुड़ चुकी है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के अनुसार, सड़ने वाले खाद्य कचरे से दुनिया के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का करीब 10 प्रतिशत हिस्सा पैदा होता है, जो विमानन (aviation) क्षेत्र से होने वाले कुल उत्सर्जन से लगभग पांच गुना अधिक है।

दुनियाभर में हर दिन एक अरब टन से ज्यादा भोजन बिना खाए फेंक दिया जाता है। हैरान करने वाली बात यह है कि इस बर्बादी का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा सीधे हमारे घरों से आता है। इसका सीधा मतलब है कि हम केवल खाना नहीं फेंक रहे, बल्कि उसे उगाने में खर्च हुई जमीन, पानी, ऊर्जा और किसानों की मेहनत को भी व्यर्थ कर रहे हैं।

कूड़े के ढेर में कैसे बनता है मीथेन का खतरा?

जब खाने का यह कचरा लैंडफिल यानी कूड़े के बड़े ढेरों में पहुंचता है, तो वहां ऑक्सीजन की कमी के कारण सूक्ष्म जीव इसे तोड़ते हैं, जिससे मीथेन गैस का उत्सर्जन होता है।

मीथेन एक बेहद शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है।

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, 20 साल की अवधि में यह कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में करीब 86 गुना अधिक गर्मी को वातावरण में रोक सकती है।

चूंकि मीथेन वातावरण में कम समय तक टिकती है, इसलिए इसके उत्सर्जन को रोकना जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को तुरंत धीमा करने का सबसे असरदार तरीका माना जाता है।

जमीन और पानी की भारी बर्बादी

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के अनुसार, दुनिया की लगभग 1.4 अरब हेक्टेयर कृषि भूमि (कुल कृषि भूमि का करीब 28%) ऐसे भोजन को उगाने में इस्तेमाल होती है जिसे अंततः खाया ही नहीं जाता। इसके साथ ही, खेती के लिए जंगलों की कटाई भी बढ़ती है, जिससे पर्यावरण को सोखने वाले प्राकृतिक 'कार्बन सिंक' कमजोर होते जा रहे हैं और जलवायु संकट का खतरा और गहरा रहा है।

समाधान के लिए दुनिया भर में उठ रहे कदम

इस समस्या से निपटने के लिए अब वैश्विक स्तर पर नए और अनूठे तरीके अपनाए जा रहे हैं:

औपचारिक प्रशिक्षण: अफ्रीका के 11 देशों में कचरा बीनने वालों को जैविक कचरे से खाद बनाने का प्रशिक्षण देकर उन्हें मुख्यधारा से जोड़ा जा रहा है।

बायो-मैनेजमेंट: मलावी और युगांडा जैसे देशों में 'ब्लैक सोल्जर फ्लाई' (एक विशेष मक्खी) के लार्वा का उपयोग जैविक कचरे को उपयोगी सामग्री में बदलने के लिए किया जा रहा है।

व्यक्तिगत स्तर पर पहल: दुनिया ने 2030 तक प्रति व्यक्ति खाने की बर्बादी को आधा करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए जरूरत है कि हम उतनी ही खरीदारी करें जितनी जरूरत हो, बचे हुए भोजन को सुरक्षित रखें और जैविक कचरे से खाद बनाएं।

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