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पेंगुइन की दुनिया पर मंडराता संकट: जलवायु परिवर्तन के कारण जावोडोव्स्की द्वीप पर दो-तिहाई घटी चिनस्ट्रैप पेंगुइनों की आबादी

अंटार्कटिका में तेजी से पिघलती उम्मीदें! दुनिया की सबसे बड़ी चिनस्ट्रैप पेंगुइन बस्ती क्यों हो रही है तबाह? जानिए क्या है इसके पीछे की असली वजह।

 

 

अंटार्कटिका की बर्फीली धरती, नीला समुद्र और वहां अठखेलियां करते हजारों पेंगुइन—यह खूबसूरत नजारा कभी इस महाद्वीप के जावोडोव्स्की द्वीप की पहचान हुआ करता था। लेकिन हाल ही में प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका 'करेंट बायोलॉजी' में प्रकाशित एक अध्ययन ने दुनिया भर के पर्यावरणविदों को झकझोर कर रख दिया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया की सबसे बड़ी चिनस्ट्रैप पेंगुइन बस्ती की आबादी साल 2011 से 2025 के बीच लगभग दो-तिहाई घट चुकी है।

आधी आबादी से भी बड़ा नुकसान और चौंकाने वाले आंकड़े

ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे के पेंगुइन विशेषज्ञों के अनुसार यह गिरावट बेहद गंभीर और चिंताजनक है। उनके मुताबिक, सिर्फ इस एक द्वीप पर लगभग पांच लाख प्रजनन करने वाले पेंगुइन कम हो गए हैं।

बस्ती का सिमटता दायरा: साल 2011 में जावोडोव्स्की द्वीप पर करीब छह लाख चिनस्ट्रैप पेंगुइन और 90 हजार मैकरोनी पेंगुइन मौजूद थे, जिससे यह दुनिया की सबसे बड़ी पेंगुइन बस्ती कहलाती थी। अब तेजी से बदलते हालातों के कारण अंटार्कटिका का 'केप अडारे' द्वीप संख्या के मामले में इससे आगे निकल सकता है।

बढ़ता तापमान: अंटार्कटिक प्रायद्वीप और उसके आसपास सर्दियों का तापमान औद्योगिक युग से पहले के मुकाबले लगभग 5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है, जो इसे पृथ्वी के सबसे तेजी से गर्म होने वाले क्षेत्रों में शुमार करता है।

गर्म होता समुद्र और छिनता भोजन

पेंगुइनों की इस भारी तबाही के पीछे सबसे मुख्य कारण इंसानों द्वारा बढ़ाई जा रही ग्लोबल वार्मिंग है।

क्रिल की दूरी: चिनस्ट्रैप पेंगुइन के भोजन का सबसे बड़ा और प्रमुख हिस्सा 'अंटार्कटिक क्रिल' नामक छोटे समुद्री जीव हैं। लेकिन समुद्र का पानी गर्म होने के कारण ये क्रिल दक्षिण की ओर वेडेल सागर की तरफ खिसक रहे हैं।

बढ़ती दूरी: दूसरी तरफ, चिनस्ट्रैप पेंगुइन द्वीप के उत्तर-पश्चिम में ठंडे पानी में भोजन तलाशना पसंद करते हैं। भोजन के स्रोतों और अनुकूल तापमान के बीच बढ़ती इस दूरी ने उनके लिए अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है।

एक ही द्वीप पर दो अलग कहानियां

इस अध्ययन का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि इसी जावोडोव्स्की द्वीप पर रहने वाले मैकरोनी पेंगुइनों की संख्या में करीब 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि मैकरोनी पेंगुइन भोजन के मामले में अधिक लचीले होते हैं और अलग-अलग तरह के खाद्य स्रोतों का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके विपरीत, चिनस्ट्रैप पेंगुइन का चुनाव सीमित है। हालांकि, मैकरोनी पेंगुइनों की यह बढ़ती संख्या भी चिनस्ट्रैप पेंगुइनों के भारी नुकसान की भरपाई करने में नाकाफी साबित हो रही है।

क्या ज्वालामुखी बना था विलेन?

साल 2016 में जावोडोव्स्की द्वीप पर एक भयंकर ज्वालामुखी विस्फोट हुआ था। उस समय वैज्ञानिकों ने आशंका जताई थी कि राख और लावा के कारण पेंगुइनों की संख्या में अचानक गिरावट आई होगी—जिसे 'पेंगुइन पोम्पेई' परिकल्पना नाम दिया गया था। लेकिन दीर्घकालिक अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि जलवायु परिवर्तन और भोजन का संकट इसके पीछे के मुख्य कारण हैं।

अध्ययन चेतावनी देता है कि जिस प्रकार किसी इमारत से लकड़ी का एक अहम टुकड़ा निकालने से पूरा ढांचा कमजोर हो जाता है, ठीक उसी तरह प्रकृति में किसी एक जीव की संख्या घटने से संपूर्ण पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ सकता है। यदि यही रफ्तार जारी रही, तो आने वाले समय में चिनस्ट्रैप पेंगुइन को आधिकारिक तौर पर 'लुप्तप्राय' (Endangered) प्रजाति की श्रेणी में रखना पड़ सकता है।

 

 

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