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शिक्षा में जेंडर और ग्रामीण-शहरी अंतर: UNESCO रिपोर्ट के आईने में

"शहरी इलाकों में बराबरी की उम्मीदों के बीच, ग्रामीण भारत की बेटियों को उच्च माध्यमिक शिक्षा तक पहुँचाना अभी भी एक बड़ी चुनौती है!"

 

 

जारी UNESCO की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण भारत में 100 लड़कों के 11वीं और 12वीं यानी उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने पर सिर्फ 59 लड़कियां ही इस स्तर की पढ़ाई पूरी कर पाती हैं। रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि शहरों में लड़के और लड़कियों के बीच बराबरी की दिशा में प्रगति हुई है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के मामले में अभी भी एक बहुत बड़ा अंतर बना हुआ है।

‘Gender Equity in Access to Education’ नाम की इस रिपोर्ट में 31 निम्न और मध्यम आय वाले देशों में शिक्षा में लड़के-लड़कियों के बीच के अंतर का बारीकी से अध्ययन किया गया है। भारत में उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने का समायोजित जेंडर पैरिटी इंडेक्स कुल मिलाकर 0.89, ग्रामीण इलाकों में 0.59 और शहरी इलाकों में 1.0 है।

कुल मिलाकर उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने का आंकड़ा 0.89 होने का सीधा मतलब यह है कि 100 लड़कों के इस स्तर की पढ़ाई पूरी करने पर करीब 89 लड़कियां भी ऐसा करती हैं।

ग्रामीण लड़कियों के सामने बड़ी चुनौतियाँ

रिपोर्ट में 2020-24 के आंकड़ों के आधार पर यह अध्ययन किया गया है कि कैसे भौगोलिक स्थिति और परिवार की आर्थिक स्थिति उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने को प्रभावित करती है।

वैश्विक और स्थानीय स्थिति: जिन देशों में लड़कियां पीछे हैं, वहां जेंडर पैरिटी इंडेक्स का औसत 0.87 था। ग्रामीण इलाकों में यह गिरकर 0.74 रह गया, जबकि शहरी इलाकों में यह 0.96 तक पहुंच गया। भारत भी इसी पैटर्न को दर्शाता है जहाँ ग्रामीण इलाकों में लड़कियां काफी पीछे हैं, जबकि शहरी इलाकों में दोनों बराबरी पर हैं।

स्कूल में दाखिले का अंतर: ASER 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, 15-16 साल की ग्रामीण लड़कियों में 8.1 प्रतिशत स्कूल में दाखिला नहीं लेती थीं (2022 में यह 7.9 प्रतिशत था)। इससे साफ पता चलता है कि बड़ी उम्र की लड़कियों को शिक्षा से जोड़े रखना एक चुनौती है।

गरीबी का प्रभाव: UNESCO की रिपोर्ट में पाया गया कि सबसे गरीब परिवारों में जेंडर पैरिटी इंडेक्स का औसत 0.66 था, जबकि सबसे अमीर 20 प्रतिशत परिवारों में यह 0.92 था। यानी गरीबी शिक्षा में इस अंतर को और बढ़ा देती है।

नीतिकार और व्यावहारिक रुकावटें

रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि शिक्षा में जेंडर का यह अंतर सिर्फ व्यक्तिगत पसंद की वजह से नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं तथा नीतियों से जुड़ा हुआ है।

लड़कियों की शिक्षा तक पहुंच बेहतर करने के लिए उन व्यावहारिक रुकावटों को दूर करना जरूरी है जो उन्हें रोकती हैं, जैसे:

आने-जाने का अधिक खर्च और स्कूल में सुरक्षा की कमी।

पर्याप्त शौचालय सुविधाओं का अभाव।

गर्भावस्था या कम उम्र में शादी की वजह से पढ़ाई छोड़ने वाली लड़कियों के लिए मदद का अभाव।

सुधार की दिशा में सकारात्मक कदम

भारत और अन्य देशों के शोध बताते हैं कि लक्षित योजनाओं से इस स्थिति को बदला जा सकता है:

शौचालय निर्माण: देशभर में शौचालय बनाने की पहल से किशोरियों के स्कूल में दाखिले में बढ़ोतरी हुई है, खासकर वहां जहां लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय बने।

मिड-डे मील: स्कूल में कम उम्र से और लगातार मिलने वाले मिड-डे मील से पढ़ाई छोड़ने की दर में कमी आई है।

अंतरराष्ट्रीय उदाहरण: नेपाल का उदाहरण देते हुए रिपोर्ट बताती है कि मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की गारंटी देने वाले कानूनों, लक्षित छात्रवृत्तियों और बेहतर सुविधाओं से वहां लड़कियों के माध्यमिक शिक्षा पूरी करने का आंकड़ा 1990 के 8 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 89 प्रतिशत हो गया है।

हालांकि, रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि अगर दूसरी बुनियादी रुकावटें (जैसे सुरक्षा या परिवहन का खर्च) बनी रहती हैं, तो केवल एक योजना या वित्तीय मदद पर्याप्त नहीं हो सकती।

 

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