"मराठवाड़ा के सूखे में फरिश्ता बनकर आए नाना पाटेकर, जिनकी यादें और काम आज भी लोगों की आंखों में आंसू और दिलों में उम्मीद जगा जाते हैं।"
महाराष्ट्र के बीड जिले की राजश्री आसाराम परदेशी के लिए आजीविका और दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर की यादें एक ही धागे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। संकट के उस दौर में जब सब कुछ धुंधला नजर आ रहा था, तब नाना पाटेकर के फाउंडेशन की ओर से मिली एक साधारण सी सिलाई मशीन ने राजश्री को सम्मान के साथ अपनी जिंदगी फिर से संवारने का अनमोल जरिया दिया था।
बृहस्पतिवार को नाना पाटेकर के निधन की खबर के बाद जब उन्होंने अपनी उसी सिलाई मशीन पर हाथ रखा, तो बरसों पुरानी यादें एक बार फिर ताजा हो गईं।
दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की उम्र में गोवा स्थित उनके आवास पर निधन हो गया। पिछले करीब एक दशक में पाटेकर ने सूखाग्रस्त मराठवाड़ा क्षेत्र में अभूतपूर्व काम किया और मराठी अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर ‘नाम फाउंडेशन’ की स्थापना की, जिसके जरिए उन्होंने अनगिनत जरूरतमंदों की जिंदगी को संभाला।
बीड के शिरूर कासार तहसील के आरवी गांव की रहने वाली परदेशी बताती हैं, ‘‘करीब 10 साल पहले नाम फाउंडेशन ने मुझे यह सिलाई मशीन दी थी। मेरे पति एक निर्माण मजदूर थे, जो काम के दौरान गिरने से गंभीर रूप से घायल हो गए और बिस्तर पर पड़ गए। उस मुश्किल समय में पूरे घर की जिम्मेदारी अचानक मेरे कंधों पर आ गई थी।’’
पाटेकर के आकस्मिक निधन से फफकते हुए उन्होंने कहा, ‘‘साड़ियों में किनारी लगाकर और ब्लाउज सिलकर मैं रोज करीब 400 से 500 रुपये और महीने में लगभग 10,000 रुपये कमा लेती हूं। यह सब नाना पाटेकर की वजह से ही संभव हो पाया है। आज सुबह मशीन को छूते ही मेरा दिल भर आया। हमारे घर में लक्ष्मी लाने वाला वह इंसान, हमारे लिए किसी फरिश्ते से कम नहीं था।’’
राजश्री का यह दर्द अकेला नहीं है, बल्कि यह मराठवाड़ा के ग्रामीण इलाकों के हजारों परिवारों का साझा दुख है। सूखे की मार झेल रहे बीड की कई ग्रामीण महिलाओं के लिए पाटेकर का जाना एक ऐसे अभिभावक के चले जाने जैसा है, जिसने उनके जीवन में सम्मान और आत्मनिर्भरता लौटाई थी।
पाटेकर और बीड के बीच का यह अटूट संबंध साल 2015 में तब बना, जब लगातार कई वर्षों के भीषण सूखे के कारण जिले में किसानों की आत्महत्याओं में चिंताजनक वृद्धि हुई थी। कृषि संकट गहराने के कारण गांव-गांव में मातम और लाचारी का माहौल था। इस मानवीय संकट को भांपते हुए पाटेकर और अनासपुरे ने आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों की सुधि ली।
उनकी यह पहल केवल फौरी राहत देने तक सीमित नहीं थी। दोनों अभिनेताओं ने प्रभावित परिवारों की महिलाओं को सिलाई मशीन, आटा चक्की और पशुधन उपलब्ध कराकर स्थायी आजीविका के साधन तैयार किए, ताकि वे अपने छोटे कारोबार शुरू कर सकें। इसके बाद ‘नाम फाउंडेशन’ के तहत व्यापक ग्रामीण विकास और जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन पर विशेष जोर दिया गया।
वर्तमान में बीड जिला एक बार फिर भीषण सूखे का सामना कर रहा है, जहां नदियां सूख चुकी हैं और ग्रामीण अपने पशुओं के लिए पानी तक के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे संकट के समय में ‘नाम फाउंडेशन’ के कार्यों की कमी लोगों को खल रही है। संगठन के जिला समन्वयक शिवराम घोडके बताते हैं कि फाउंडेशन ने बीड में पानी की किल्लत से निपटने के लिए बड़े पैमाने पर जल संरक्षण के काम किए हैं।
बीड तहसील के पिंपलनेर क्षेत्र में फाउंडेशन ने ऋद्धि सिद्धि नदी के 34 किलोमीटर लंबे हिस्से में गाद निकलवाकर उसे चौड़ा करने का ऐतिहासिक काम कराया था। इस पहल के बाद राज्य सरकार ने उस नदी पर चार छोटे बांध भी बनाए, जिससे आसपास के 14 गांवों के लोगों को सीधा लाभ मिला। जिलेभर में नालों, छोटी नदियों और जलाशयों से गाद निकालने के लिए अर्थमूवर मशीनें लगाई गईं, जिसके परिणामस्वरूप करीब 10,000 हेक्टेयर भूमि सिंचाई के दायरे में आई और लगभग एक लाख किसानों को इसका प्रत्यक्ष लाभ मिला।
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