प्रतिवर्ष 14 अगस्त को मनाया जाने वाला विश्व छिपकली दिवस हमें प्रकृति के इस बेहद महत्वपूर्ण परंतु उपेक्षित जीव के संरक्षण और जैव विविधता में इसके योगदान को समझने का संदेश देता है।
हर साल 14 अगस्त को विश्व छिपकली दिवस (World Lizard Day) मनाया जाता है। यद्यपि यह दिन पारंपरिक रूप से मुख्यधारा के आयोजनों में बहुत अधिक प्रसिद्ध नहीं है, लेकिन वन्यजीव प्रेमियों, पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों के लिए यह दिन छिपकलियों और अन्य सरीसृपों के प्रति समाज में जागरूकता फैलाने का एक विशिष्ट अवसर प्रदान करता है। इस अवसर पर विभिन्न शिक्षण संस्थानों, पार्कों और पर्यावरण संरक्षण संगठनों द्वारा इन अद्वितीय जीवों के व्यवहार और पारिस्थितिकी तंत्र में उनकी भूमिका पर जानकारी साझा की जाती है।
विश्व भर में छिपकलियों की 6,000 से अधिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं। ये अत्यंत अनुकूलनशील जीव हैं जो घने जंगलों, तपते रेगिस्तानों, पर्वतीय श्रृंखलाओं से लेकर घास के मैदानों और शहरी आवासों तक में सरलता से जीवित रह सकते हैं।
विविधता: छिपकली की विभिन्न प्रजातियाँ आकार, रंग, शारीरिक संरचना और जीवन-शैली में व्यापक विविधता प्रदर्शित करती हैं।
आवास: कुछ प्रजातियाँ वृक्षों (Arboreal) पर जीवन बिताती हैं, कुछ पूर्णतः धरातल पर, जबकि कुछ चट्टानी व मरुस्थलीय क्षेत्रों के कठोर वातावरण के प्रति अनुकूलित होती हैं।
हालाँकि 'विश्व छिपकली दिवस' की शुरुआत कब और किसके द्वारा की गई, इसका कोई स्पष्ट ऐतिहासिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं है, परंतु वर्तमान में यह दिवस सरीसृपों के संरक्षण हेतु एक वैश्विक मंच बन चुका है।
छिपकली और अन्य सरीसृप प्राकृतिक भोजन श्रृंखला (Food Chain) का एक अनिवार्य घटक हैं। वे शिकार और शिकारी—दोनों की भूमिका निभाते हैं:
जैविक कीट नियंत्रक: अधिकांश छिपकलियाँ मुख्य रूप से कीड़े-मकोड़ों का भक्षण करती हैं। इससे कृषि फसलों, बाग-बगीचों और घरों के आसपास नुकसान पहुँचाने वाले हानिकारक कीटों की आबादी प्राकृतिक रूप से नियंत्रित रहती है।
भोजन का स्रोत: छिपकलियाँ खुद भी कई बड़े स्तनधारियों, पक्षियों (जैसे बाज, उल्लू) और साँपों का मुख्य आहार बनती हैं, जिससे खाद्य जाल (Food Web) में ऊर्जा का प्रवाह बना रहता है।
परागण और बीज प्रसार: कुछ विशिष्ट सरीसृप पौधों में परागण (Pollination) और बीजों के प्रकीर्णन में सहायता करते हैं। उदाहरण के लिए, मॉरीशस में पाई जाने वाली ब्लू-टेल्ड डे गेको (Blue-tailed Day Gecko) स्थानीय वनस्पतियों के परागण में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
मानव इतिहास में सरीसृपों की उपस्थिति प्राचीन काल से रही है। लोककथाओं, पौराणिक संदर्भों और धार्मिक प्रतीकों में कछुए को दीर्घायु व स्थिरता का तथा सर्प को शक्ति और पुनर्जन्म का प्रतीक माना गया है।
इसके बावजूद, आधुनिक मानवीय गतिविधियों के कारण छिपकलियों और सरीसृपों की कई प्रजातियों के अस्तित्व पर गंभीर संकट मँडरा रहा है:
आवास का विनाश: अंधाधुंध वनों की कटाई, तीव्र शहरीकरण और प्राकृतिक भू-भाग का क्षरण इनके प्राकृतिक निवास को समाप्त कर रहा है।
अवैध वन्यजीव व्यापार: अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में साँपों, मगरमच्छों और दुर्लभ छिपकलियों का शिकार चमड़े के सामान (बैग, बेल्ट, जूते), सजावटी वस्तुओं और पारंपरिक औषधियों के लिए किया जाता है।
जलवायु परिवर्तन व प्रदूषण: वैश्विक तापमान में वृद्धि और रसायनों का अत्यधिक उपयोग सरीसृपों के प्रजनन और जीवन चक्र को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है।
विश्व छिपकली दिवस केवल एक जीव के बारे में जानने का अवसर नहीं है, बल्कि यह इस बात का स्मरण कराता है कि प्रकृति में कोई भी जीव अनुपयोगी नहीं है। छोटा दिखने वाला यह जीव पर्यावरण के सूक्ष्म संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
सरीसृपों के प्रति जनमानस में व्याप्त भ्रांतियों और भय को दूर कर वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। प्राकृतिक आवासों का संरक्षण, वन्यजीवों के अवैध व्यापार पर कठोर प्रतिबंध और पर्यावरण जागरूकता के माध्यम से ही हम इन अनमोल जीवों और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र सुनिश्चित कर सकते हैं।