छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में काजल नदी पर ग्रामीणों द्वारा स्वयं निर्मित रप्टा न केवल 15 पंचायतों की दूरी 40 किलोमीटर कम करता है, बल्कि उनकी आजीविका और आत्मनिर्भरता की प्रतीक रेखा भी खींचता है।
छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के सुदूर हिस्से में स्थित जबर्रा गाँव के मुहाने पर काजल नदी कलकल बहती है। किनारे पर चहल-पहल है—महिलाएँ सिर पर जंगली घासों का भारी बोझा उठाकर नदी की धार में बिछा रही हैं और जेसीबी मशीन उन पर मिट्टी की परत डाल रही है। 60 वर्षीया बीरझा सोरी अपने पसीने से तर-बतर चेहरे को पोंछते हुए कहती हैं, "यह काम तो हम हर बरस करते हैं, तभी जाकर दो पैसे की बचत हो पाती है। नहीं तो जंगल की उपज बेचने जाएँ तो आधा पैसा गाड़ियों के भाड़े में ही निकल जाता है।"
जबर्रा के ग्रामीणों के लिए यह कच्चा पुल (रप्टा) केवल मिट्टी और घास का ढाँचा नहीं है, बल्कि उनकी आर्थिक स्वायत्तता, श्रमदान की परंपरा और पीढ़ियों पुराने ज्ञान का साक्षात प्रमाण है।
काजल नदी पर पिछले 24 सालों से लगातार बन रहे इस रप्टे के लिए ग्रामीणों ने कभी किसी सिविल इंजीनियर का रुख नहीं किया। देहरी पर बैठे रामबाहू नेताम बताते हैं कि उनके दादा-परदादाओं ने बहती नदी के प्राकृतिक प्रवाह को बिना नुकसान पहुँचाए पुल बनाने की जो कला सिखाई थी, वही आज भी काम आ रही है।
इंजीनियरिंग का देसी तरीक़ा: रप्टे को इस तरह तैयार किया जाता है कि जब बारिश के मौसम में नदी में उफान आए, तो पानी आसानी से इसके ऊपर से बहकर निकल जाए और ढाँचे को कम से कम नुकसान हो।
15 पंचायतों को बड़ी राहत: इस रप्टे के बनने से आसपास की लगभग 15 ग्राम पंचायतों को गरियाबंद ज़िला और नगरी ब्लॉक पहुँचने के लिए 36 से 40 किलोमीटर की दूरी कम तय करनी पड़ती है। जबर्रा से धमतरी मुख्यालय 61 किमी दूर है, जबकि नगरी और गरियाबंद महज 10-12 किमी की दूरी पर हैं।
रप्टा निर्माण के दौरान गाँव का सामाजिक ढाँचा और अनुशासन देखते ही बनता है। ग्राम वन प्रबंधन समिति के दिशानिर्देशों के तहत निर्माण कार्य संचालित होता है:
हर घर से भागीदारी: निर्माण शुरू होने से पूरा होने तक हर परिवार से एक सदस्य रोज़ श्रमदान करता है। आवश्यकता पड़ने पर प्रति परिवार दो सदस्यों की ड्यूटी लगाई जाती है।
सख्त लैंगिक संतुलन (50:50): समिति यह सुनिश्चित करती है कि श्रमदान में पुरुषों और महिलाओं की संख्या बिल्कुल बराबर (आधी-आधी) रहे। इसमें किसी भी तरह का विचलन स्वीकार्य नहीं होता।
लागत का सामूहिक वहन: मशीनरी और ईंधन के खर्च के लिए प्रति घर अंशदान तय किया जाता है। इस बार प्रति परिवार ₹500 तय किए गए हैं, जिससे 100 परिवारों के सहयोग से ₹50,000 की शुरुआती राशि जुटाई गई है।
जबर्रा गाँव में निजी क्षेत्र की नौकरियां न के बराबर हैं और पूरी आबादी में सिर्फ़ एक व्यक्ति सरकारी चपरासी के पद पर है। ग्रामीणों का 6 महीने का गुजारा पूरी तरह अक्टूबर से मार्च के बीच एकत्रित की जाने वाली वनोपज (जैसे सामान्य जिमीकंद ₹40/किग्रा और दुर्लभ 'करुकांदा' ₹60/किग्रा) से चलता है।
हालाँकि, ग्रामीण अपनी कुल वन उपज का केवल 20 प्रतिशत हिस्सा ही सरकार को बेचते हैं, जबकि 80 प्रतिशत हिस्सा खुले हाट-बाजारों में बेचा जाता है। इसके पीछे कई व्यावहारिक कारण हैं:
तत्काल नकदी (Cash) की ज़रूरत: बेंदापानी की मीना नेताम बताती हैं कि सरकार का पैसा सीधे बैंक खाते में आता है, जिसमें काफ़ी देरी होती है। दैनिक खर्च चलाने के लिए आदिवासियों को हाट-बाजार से तुरंत नकद पैसा चाहिए होता है।
साक्षरता और बैंकिंग की समस्या: गाँव में औपचारिक शिक्षा का अभाव होने के कारण कई ग्रामीण बैंक पासबुक देखना, पढ़ना या खाते में आए पैसे की सटीक गिनती करना नहीं जानते।
सरकारी गुणवत्ता के कड़े नियम: ग्रामीणों की शिकायत है कि सरकारी खरीद के दौरान पत्तियों से बने पत्तलों या अन्य वनोपज में नमी या आकार का बहाना बनाकर बड़ी मात्रा में उपज रद्द कर दी जाती है।
राज्य गठन (2001) के समय जहाँ छत्तीसगढ़ सरकार केवल 7 प्रकार की वनोपज की खरीद करती थी, वहीं वर्ष 2024-25 में राज्य भर में 67 प्रकार की वनोपजों की खरीद की जा रही है, जिनमें से 19 प्रकार की वनोपज अकेले जबर्रा क्षेत्र में खरीदी जाती हैं।
इसके बावजूद, ज़मीनी स्तर पर कागज़ी प्रक्रियाओं, बैंक भुगतानों में देरी और तकनीकी जटिलताओं के कारण ग्रामीण आज भी खुले हाट-बाजारों और अपनी पारंपरिक व्यवस्था पर अधिक भरोसा जताते हैं। जबर्रा का यह रप्टा सिर्फ़ नदी के दो छोरों को नहीं जोड़ता, बल्कि प्रशासनिक उपेक्षा के बीच ग्रामीणों के अटूट हौसले और सामूहिक स्वावलंबन को भी एक सूत्र में पिरोता है।