पेट्रोलियम, केमिकल और पेट्रोकेमिकल उद्योग (PCPIR) के केंद्र के रूप में विकसित हुए दहेज क्षेत्र में औद्योगिक अपशिष्ट और समुद्री प्रदूषण के कारण स्थानीय मछुआरों की आजीविका पर गंभीर प्रभाव पड़ा है।
गुजरात के भरूच जिले में स्थित दहेज (Dahej) क्षेत्र आज देश का सबसे तेजी से उभरता हुआ पेट्रोलियम, केमिकल और पेट्रोकेमिकल्स इन्वेस्टमेंट रीजन (PCPIR) है। जहाँ एक तरफ ₹1 लाख करोड़ से अधिक के औद्योगिक निवेश ने इस क्षेत्र को वैश्विक पहचान दी है, वहीं दूसरी ओर इसने खंभात की खाड़ी के पारंपरिक मछुआरा समुदाय की सामाजिक-आर्थिक स्थिति और स्थानीय पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव डाला है।
गुजरात का 1,600 किमी लंबा तटीय क्षेत्र पारंपरिक रूप से समृद्ध समुद्री अर्थव्यवस्था का केंद्र रहा है। वर्ष 1990 में एसईज़ेड (SEZ) और अप्रैल 2007 में भारत सरकार की पीसीपीआईआर (PCPIR) नीति लागू होने के बाद, भरूच के वागरा और भरूच तालुका के 44 गांवों (453 वर्ग किमी.) में बड़े औद्योगिक घरानों ने अपनी इकाइयां स्थापित कीं।
मछली पकड़ने में गिरावट: औद्योगिक अपशिष्ट के कारण खंभात की खाड़ी में मछलियों की संख्या और आकार दोनों में भारी कमी आई है।
आय का अंतर: भरूच जिला माछीमार समाज के आंकड़ों के अनुसार, पहले एक कुशल मछुआरा सालाना ₹10-15 लाख और एक सामान्य मछुआरा ₹4-5 लाख तक कमा लेता था। वर्तमान में मछुआरे दैनिक 1-2 किलो मछली ही पकड़ पाते हैं, जिससे दैनिक आमदनी ₹100-200 तक सिमट गई है।
श्रमिकों में परिवर्तन: जिस भूमि पर कभी स्थानीय ग्रामीणों का अधिकार था, आज वे उन्हीं औद्योगिक इकाइयों में ₹10,000 से ₹15,000 मासिक के अनुबंध (Contractual) वेतन पर काम करने को मजबूर हैं।
| पहलू | औद्योगिक विकास से पूर्व | वर्तमान स्थिति |
|---|---|---|
| मुख्य आजीविका | स्वतंत्र मछली पालन एवं वनोपज | संविदा मजदूरी (Contractual Labor) |
| दैनिक मछली पकड़ | 20 से 40 किग्रा / नाव | 1 से 2 किग्रा / नाव |
| अनुमानित वार्षिक आय | ₹4 लाख से ₹15 लाख | ₹1.2 लाख से ₹1.8 लाख (संविदा वेतन) |
| स्वास्थ्य स्थिति | सामान्य | केमिकल प्रदूषण जनित चर्म रोग व श्वसन संबंधी समस्याएं |
खंभात की खाड़ी क्षेत्र पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील है, जहाँ नर्मदा का मीठा पानी समंदर के खारे पानी से मिलता है। यह क्षेत्र झींगा, बुमला, सालमन, बोई, माकुल और हिल्सा जैसी मछलियों का प्रमुख प्रजनन स्थल है।
[औद्योगिक इकाई (ETP)] │ ▼ (क्षतिग्रस्त पाइपलाइन / अनौपचारिक निकासी) [तटीय समुद्री जल / खंभात की खाड़ी] │ ▼ [पारिस्थितिकी क्षति: हिल्सा व झींगा प्रजातियों का ह्रास]
अपशिष्ट जल निकासी (Effluent Disposal): नियमों के अनुसार औद्योगिक अपशिष्ट (Effluent) को उपचारित (Treatment) करने के बाद गहरे समुद्र (तकरीबन 4 किमी भीतर) में छोड़ा जाना अनिवार्य है। हालाँकि, गुजरात इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (GIDC) की समुद्री पाइपलाइन वर्ष 2018 से क्षतिग्रस्त पाई गई, जिसके परिणामस्वरूप अपशिष्ट तट के समीप ही एकत्र होता रहा।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की रिपोर्ट (2022): एनजीटी द्वारा गठित जांच समिति ने पाया कि कई औद्योगिक इकाइयां बिना उपचार (Untreated) किए दूषित जल को सीधे समुद्र और जमीन के भीतर (Mainholes के माध्यम से) छोड़ रही थीं।
निगरानी प्रणाली की सीमाएं: गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (GPCB) के भरूच कार्यालय में 453 वर्ग किमी के विशाल क्षेत्र की निगरानी के लिए मात्र 6 लैबोरेटरी और 5 तकनीकी कर्मचारी तैनात हैं, जिससे प्रभावी मॉनिटरिंग में बाधा आती है।
औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले हानिकारक पेट्रोकेमिकल (जैसे बेंजीन, पॉलीप्रोपीलीन और अन्य औद्योगिक सॉल्वेंट्स) के सीधे संपर्क में आने से तटीय समुदायों को गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है:
त्वचा एवं श्वसन रोग: तटीय जल में उतरने वाले मछुआरों में रासायनिक दाने (Skin rashes) और तीव्र खुजली की शिकायतें आम हैं।
अनुकूलन की मजबूरी: स्थानीय युवा आईटीआई (ITI) जैसे तकनीकी पाठ्यक्रमों की ओर रुख कर रहे हैं ताकि वे इन रासायनिक कारखानों में सुरक्षा और तकनीकी भूमिकाओं के लिए प्रयास कर सकें, हालाँकि स्थायी नौकरियों का अनुपात बहुत कम है।
दहेज पीसीपीआईआर भारत के पेट्रोकेमिकल विनिर्माण क्षेत्र और आर्थिक संवृद्धि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। हालाँकि, भारत के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) — विशेषकर SDG 14 (जल के नीचे जीवन) और SDG 8 (उत्कृष्ट कार्य और आर्थिक वृद्धि) — को प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित कदम आवश्यक हैं:
पाइपलाइन और ईटीपी (ETP) की तत्काल मरम्मत: कॉमन एफ़्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (CETP) की कार्यप्रणाली को चुस्त-दुरुस्त बनाना और गहरे समुद्र की पाइपलाइन को शीघ्र दुरुस्त करना।
जीपीसीबी (GPCB) का सशक्तिकरण: निगरानी हेतु तकनीकी कर्मचारियों की संख्या और स्वचालित रियल-टाइम वाटर क्वालिटी मॉनिटरिंग स्टेशन बढ़ाना।
स्थानीय समुदायों का पुनर्वास एवं कल्याण: मछुआरा समुदाय के लिए वैकल्पिक आजीविका प्रोत्साहन, कौशल विकास और प्रदूषण प्रभावित परिवारों के लिए व्यापक स्वास्थ्य बीमा योजनाएं लागू करना।