संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी: अब दूर का खतरा नहीं रहा समुद्र का जलस्तर, मुंबई और कोलकाता जैसे महानगरों पर विस्थापन का मंडराया तात्कालिक साया।
संयुक्त राष्ट्र की हालिया रिपोर्ट 'समुद्र के बढ़ते जलस्तर से जुड़ी चुनौतियां और उनसे निपटने के तरीके' ने जलवायु परिवर्तन की एक भयावह तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के अनुसार, समुद्र का बढ़ता जलस्तर अब केवल आने वाले समय की कोई सुदूर आशंका नहीं है, बल्कि यह दर्ज इतिहास में सबसे तेज गति से घटित हो रहा है। मानव जनित ग्लोबल वार्मिंग, ग्लेशियरों के पिघलने और महासागरों के अभूतपूर्व तापीय विस्तार के कारण समुद्र का स्तर हर साल नए रिकॉर्ड तोड़ रहा है।
वैश्विक गति और भयावह आंकड़े
जलवायु प्रणाली में दर्ज तापमान वृद्धि के कारण समुद्र के जलस्तर में अभूतपूर्व उछाल आया है:
ऐतिहासिक वृद्धि: 2014 से 2023 के बीच वैश्विक समुद्र स्तर में औसतन 4.7 मिमी प्रति वर्ष की दर से वृद्धि हुई। वर्ष 2024 में 'एल नीनो' और महासागरों के तेजी से गर्म होने के कारण यह दर 5.9 मिमी प्रति वर्ष के नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई।
2012-2025 का दौर: 2012 से 2025 की अवधि के दौरान औसतन 4.75 मिमी प्रति वर्ष की वृद्धि दर्ज की गई। कुछ क्षेत्रों में महासागरों का गर्म होना पिछले 4,000 वर्षों में सबसे तेज रहा है।
जोखिम में वैश्विक आबादी: दुनिया की लगभग 10 प्रतिशत आबादी—यानी लगभग 770 मिलियन लोग—ऐसे तटीय क्षेत्रों में निवास करती है जो उच्च ज्वार रेखा से 5 मीटर से भी कम ऊंचाई पर स्थित हैं।
इंसानी जान बनाम भारी वित्तीय नुकसान
यह संकट पूरी दुनिया को प्रभावित कर रहा है, लेकिन इसके सामाजिक और आर्थिक परिणाम अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न हैं:
वित्तीय जोखिम (विकसित देश): अमेरिका के मियामी और न्यूयॉर्क तथा चीन के गुआंगझू जैसे उच्च आय वाले शहरों में 2 खरब से 3.5 खरब अमेरिकी डॉलर की तटीय संपत्तियों पर गंभीर वित्तीय जोखिम मंडरा रहा है।
मानवीय विस्थापन (दक्षिण एशिया): भारत के मुंबई और कोलकाता तथा बांग्लादेश के ढाका जैसे निचले डेल्टा क्षेत्रों में सबसे बड़ा असर मानवीय विस्थापन के रूप में दिख रहा है। यहां 1.4 करोड़ (14 मिलियन) से अधिक लोग स्थायी जलभराव के कारण अपने घर खोने के तात्कालिक खतरे का सामना कर रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि तटीय जोखिमों के आकलन में वित्तीय संपत्तियों के नुकसान के साथ-साथ इंसानी जिंदगी और विस्थापन जैसे सामाजिक जोखिमों को भी समान प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
बुनियादी ढांचे और जनस्वास्थ्य पर गहरा आघात
समुद्र का बढ़ता जलस्तर शहरी बुनियादी ढांचे, जल प्रणालियों, परिवहन नेटवर्क, ऊर्जा ग्रिड, इमारतों और भूजल संसाधनों को पहले ही भारी नुकसान पहुंचा रहा है।
पेयजल और कृषि संकट: खारा पानी तेजी से अंतर्देशीय जलस्रोतों में प्रवेश कर रहा है, जिससे कुओं और मिट्टी में लवणता बढ़ रही है। समुद्री तूफानों से भूजल का दीर्घकालिक संदूषण हो रहा है, जिससे पेयजल सुरक्षा, सिंचाई और कृषि उत्पादकता सीधे तौर पर प्रभावित हो रही है।
स्वास्थ्य जोखिम: तटीय स्वच्छता बुनियादी ढांचे के ध्वस्त होने से जलजनित बीमारियों, शारीरिक चोटों, मृत्यु दर और मानसिक स्वास्थ्य तनाव में वृद्धि हो रही है।
पारिस्थितिकी का क्षरण: जलस्तर में वृद्धि और भू-धंसाव (land subsidence) के कारण तटीय पारिस्थितिकी तंत्र नष्ट हो रहे हैं, जिससे छोटे पैमाने के मत्स्य पालन, स्थानीय पर्यटन और बंदरगाह आधारित आजीविका पर निर्भर कमजोर वर्ग बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं।
आगे की राह: एकीकृत और दीर्घकालिक नीति की आवश्यकता
समुद्र का बढ़ता जलस्तर एक ऐसे "खतरे के गुणक" (threat multiplier) के रूप में कार्य कर रहा है जो बुनियादी ढांचे को नष्ट कर सीमाओं और क्षेत्रों के अस्तित्व के लिए खतरा बन रहा है। चूंकि इस प्रक्रिया के प्रभावों को उलटना लगभग असंभव है, इसलिए शुरुआती और दीर्घकालिक अनुकूलन योजनाएं बनाना अनिवार्य है।
रिपोर्ट में इस बात पर विशेष बल दिया गया है कि प्रभावित आबादी और जोखिम वाले देशों को सशक्त बनाने के लिए पर्याप्त और सुलभ वित्त पोषण, वैज्ञानिक व डेटा क्षमताओं को मजबूत करने और ठोस संस्थागत व कानूनी ढांचे को तत्काल लागू करने की आवश्यकता है।