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तंबाकू मुक्ति की जंग: केवल इच्छाशक्ति काफी नहीं, वैश्विक स्तर पर लचर स्वास्थ्य प्रणालियों का शिकार हो रहे करोड़ों लोग

130 करोड़ उपयोगकर्ताओं तक नहीं पहुंच पा रहीं तंबाकू छुड़ाने की प्रभावी सेवाएं; लैंसेट व न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन के अध्ययनों ने उजागर की स्वास्थ्य प्रणालियों की वैश्विक नाकामी।

 

 

तंबाकू और धूम्रपान की लत से बाहर निकलना केवल किसी व्यक्ति की इच्छाशक्ति का परीक्षण नहीं है, बल्कि यह एक जटिल जैविक व मानसिक संघर्ष है। एक वैश्विक अध्ययन ने यह खुलासा किया है कि दुनिया भर में तंबाकू का सेवन करने वाले लगभग 130 करोड़ लोगों के पास लत से छुटकारा पाने के लिए जरूरी डॉक्टर की सलाह, नियमित परामर्श और प्रमाणित दवाओं की पहुंच ही नहीं है।

तंबाकू से हर साल दुनिया भर में 70 लाख से अधिक मौतें होती हैं, फिर भी इसे छुड़ाने वाली सेवाएं अधिकांश जरूरतमंदों की पहुंच से बाहर हैं।

संकट के प्रमुख बिंदु और वैश्विक आंकड़े

यूनिवर्सिटी ऑफ यॉर्क, न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय और हार्वर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए इस व्यापक अध्ययन में तंबाकू संकट के भयावह आंकड़े सामने आए हैं:

विकासशील देशों पर भारी बोझ: तंबाकू का सेवन करने वाली 80% से अधिक आबादी निम्न और मध्यम आय वाले देशों (LMICs) में रहती है।

किशोरों पर खतरा: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, तंबाकू उद्योग की आक्रामक रणनीति के कारण दुनिया भर के लगभग 4 करोड़ किशोर तंबाकू और निकोटिन के जाल में फंस चुके हैं।

भारत में भयावह स्थिति:

भारत तंबाकू का दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है।

'ग्लोबल एडल्ट टोबेको सर्वे' (GATS) के अनुसार, भारत में 29% वयस्क (लगभग 26.7 करोड़ लोग) किसी न किसी रूप में (खैनी, गुटखा, सिगरेट, बीड़ी आदि) तंबाकू का सेवन करते हैं।

'लैंसेट' के अध्ययन के मुताबिक, भारत में धूम्रपान के कारण हर साल 10 लाख से अधिक मौतें होती हैं, जिसमें पिछले तीन दशकों में 58.9% का इजाफा हुआ है।

जमीनी हकीकत: दावों और सुविधाओं में बड़ा अंतर

अध्ययन के अनुसार, अधिकांश सरकारें मदद उपलब्ध कराने का दावा करती हैं, लेकिन वास्तव में महज 13 निम्न आय वाले देशों में ही WHO के मानकों के अनुरूप संपूर्ण सहायता (व्यवहार संबंधी परामर्श और रियायती/मुफ्त दवाएं) उपलब्ध है।

शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि भारत और वियतनाम जैसे देशों में तंबाकू छुड़ाने वाली सेवाओं की राह में सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यताएं, धन की कमी, तंबाकू उद्योग का अनैतिक प्रभाव और कमजोर नीतियां मुख्य बाधाएं हैं।

समाधान के प्रभावी मॉडल और नीतिगत सिफारिशें

'न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन' में प्रकाशित इस रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने सीमित संसाधनों वाले देशों के लिए निम्नलिखित व्यावहारिक समाधान सुझाए हैं:

रणनीति / मॉडलक्रियान्वयन और लाभ
'आस्क-एडवाइज-कनेक्ट' मॉडलडॉक्टर सामान्य जांच के दौरान मरीज से तंबाकू सेवन के बारे में पूछें, सलाह दें और सीधे इलाज से जोड़ें।
सामुदायिक व डिजिटल सेवाएंग्रामीण इलाकों में आशा व सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं द्वारा मार्गदर्शन; 'नेशनल क्विटलाइन' और मोबाइल ऐप से परामर्श।
किफायती एवं सुलभ दवाएंनिकोटीन पैच, साइटिसिन और वेरेनिक्लीन जैसी दवाओं को राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजनाओं व बीमा के तहत पूरी तरह मुफ्त/सब्सिडीकृत किया जाए।

लत से जूझ रहे व्यक्ति को उपदेश नहीं, इलाज की जरूरत

यूनिवर्सिटी ऑफ यॉर्क के प्रोफेसर कामरान सिद्दीकी और न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर डोना शेली का मानना है कि तंबाकू छुड़ाने की सेवाओं को सामान्य प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं (Primary Healthcare) का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

किसी व्यक्ति को केवल उसकी लत के लिए दोषी ठहराना या "छोड़ दो" का उपदेश देना समाधान नहीं है। यदि स्वास्थ्य व्यवस्थाएं वैज्ञानिक उपचार और मानसिक सहारा मरीज के दरवाजे तक पहुंचा दें, तो तंबाकू मुक्ति की यह व्यक्तिगत लड़ाई लाखों जिंदगियां बचाने वाले एक सफल वैश्विक अभियान में बदल सकती है।

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