अवैध निर्माण, जाली बैच और अंतरराष्ट्रीय अलर्ट के बीच भारत की स्वास्थ्य सुरक्षा पर मंडराता गंभीर संकट।
भारत में नकली दवाओं और अवैध निर्माण का कारोबार अब एक ऐसे खौफनाक मोड़ पर पहुंच गया है, जहां लोगों की जिंदगी बचाने वाले टीके भी सुरक्षित नहीं हैं। देश में रेबीज के इलाज के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली वैक्सीन 'अभयरेब' (Abhayrab) के नाम पर फल-फूल रहे फर्जीवाड़े ने भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।
अभयरेब का बाजार में दबदबा
'अभयरेब' का निर्माण इंडियन इम्यूनोलॉजिकल लिमिटेड (IIL) अपने 'ह्यूमन बायोलॉजिकल्स इंस्टीट्यूट' के जरिए करती है। भारत के घरेलू रेबीज वैक्सीन बाजार में अकेले IIL की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत है। रेबीज जैसे जानलेवा संक्रमण में समय पर सही वैक्सीन का मिलना ही जीवन की एकमात्र गारंटी होता है।
दिल्ली में छापेमारी से हुआ खुलासा
22 अप्रैल 2026 को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच और दिल्ली ड्रग्स कंट्रोल डिपार्टमेंट ने मुखर्जी नगर स्थित एक अवैध रिहायशी ठिकाने पर छापेमारी कर इस बड़े गिरोह का पर्दाफाश किया।
ज़ब्त सामग्री: मौके से फर्जी 'अभयरेब' के लेबल और बैच नंबर KE25012 वाली कई शीशियां बरामद की गईं। मामले में चार लोगों को गिरफ्तार किया गया।
लैब टेस्ट में फेल: कसौली स्थित 'सेंट्रल ड्रग्स लेबोरेटरी' (CDL) की जांच में ये सैंपल पोटेंसी (क्षमता) टेस्ट में पूरी तरह फेल हो गए। लैब ने इन्हें "मानक गुणवत्ता के नहीं" (NSQ) और गलत लेबल वाले करार दिया।
जाली पैकेजिंग: ज़ब्त शीशियों की पैकेजिंग, आर्टवर्क, QR-कोड, ढक्कन के रंग और लाइसेंस विवरण में असली शीशियों के मुकाबले कई गंभीर अंतर पाए गए।
IIL का पक्ष: क्या असली बैच खराब था?
निर्माता कंपनी IIL ने ज़ब्त की गई फर्जी शीशियों से अपना कोई भी संबंध होने से साफ इनकार किया है:
असली KE25012 बैच में कुल 83,370 शीशियां शामिल थीं, जिन्हें सभी जरूरी गुणवत्ता परीक्षणों के बाद 7 नवंबर 2025 को आधिकारिक नेटवर्क में जारी किया गया था।
CDSCO की पुष्टि के अनुसार असली बैच का कोई हिस्सा निर्यात नहीं हुआ था।
जांच से स्पष्ट हुआ कि असली निर्माण में कोई खराबी नहीं थी, बल्कि असामाजिक तत्वों द्वारा असली बैच नंबर की चोरी कर नकली वैक्सीन तैयार की गई थी।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हड़कंप
यह विवाद सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहा। दिसंबर 2025 में ऑस्ट्रेलिया के 'टेक्निकल एडवाइजरी ग्रुप ऑन इम्यूनाइजेशन' (ATAGI) ने भी भारत में अभयरेब के एक अन्य फर्जी बैच (KA24014) की रिपोर्ट पर अलर्ट जारी किया था। इसके तहत नवंबर 2023 के बाद भारत यात्रा के दौरान टीका लगवाने वाले यात्रियों को ऑस्ट्रेलिया में एहतियातन रिप्लेसमेंट डोज लेने की सलाह दी गई थी। इससे पहले मार्च 2025 में दिल्ली ड्रग्स कंट्रोल डिपार्टमेंट भी ऐसी एडवाइजरी जारी कर चुका था।
नकली वैक्सीन क्यों है बेहद खतरनाक?
| पहलू | स्थिति / आंकड़ा |
|---|---|
| बीमारी का जोखिम | लक्षण दिखने के बाद रेबीज 100% जानलेवा है। |
| वार्षिक मामले | भारत में हर साल जानवरों के काटने के 90-91 लाख मामले और औसतन 5,726 मौतें दर्ज होती हैं। |
| झूठी सुरक्षा (False Sense of Security) | नकली या पानी भरी वैक्सीन लगवाने पर मरीज खुद को सुरक्षित मान लेता है, जबकि शरीर में एंटीबॉडी न बनने से उसकी मौत हो जाती है। |
क्या वैक्सीन लगने के बाद हुई मौतें नकली टीके से जुड़ी हैं?
वैक्सीन के बावजूद हुई मौतों पर नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेस (NIMHANS) ने 89 मामलों की विस्तृत जांच की। निष्कर्षों के अनुसार:
केवल 3 मामलों में ही इलाज (वैक्सीन) फेल हुआ था।
अधिकांश मौतों की असली वजह प्रोटोकॉल में लापरवाही थी—जैसे घाव को तुरंत पानी से न धोना, वैक्सीन में देरी, या गंभीर मामलों में 'रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन' न देना।
इससे साफ है कि असली वैक्सीन के साथ-साथ संपूर्ण इलाज प्रोटोकॉल का पालन होना भी उतना ही आवश्यक है।
संगठित दवा माफिया का बढ़ता दायरा
ASP-क्रिसिल इंटेलिजेंस की 'स्टेट ऑफ काउंटरफिटिंग इन इंडिया 2025' रिपोर्ट के मुताबिक, उपभोक्ता मानते हैं कि बाजार में बिकने वाली लगभग 28% दवाएं नकली या संदेहास्पद हो सकती हैं। माफिया अब सिर्फ सामान्य गोलियां नहीं, बल्कि कैंसर-रोधी दवाएं और रेबीज जैसे लाइफ-सेविंग टीके भी बना रहा है। ये जालसाज असली सप्लायर्स से पैकेजिंग और QR कोड की नकल करके रिटेलर्स को 60 से 80 प्रतिशत डिस्काउंट का लालच देकर नेटवर्क में सामान खपाते हैं।
नकली रेबीज वैक्सीन बेचना सिर्फ एक व्यापारिक अपराध नहीं, बल्कि सीधे-सीधे मानव हत्या का प्रयास है। यद्यपि DCGI ने संदिग्ध बैच KE25012 की बिक्री पर सख्त निगरानी के निर्देश दिए हैं, लेकिन जब तक इस माफिया के खिलाफ फास्ट-ट्रैक अदालतों के जरिए कठोर सजा और सप्लाई चेन का पारदर्शी 'ट्रैक-एंड-ट्रेस' सिस्टम लागू नहीं होता, तब तक मरीजों की जान जोखिम में ही बनी रहेगी।