यूसीएलए हेल्थ के वैज्ञानिकों का दावा—दिमाग के एमिग्डाला में मौजूद एस्ट्रोसाइट्स और उनके ‘प्राइमरी सिलियम’ में छिपा है चिंता और अवसाद के सटीक इलाज का नया मार्ग।
लंबे समय तक रहने वाला मानसिक तनाव केवल हमारे मूड, व्यवहार या दिनचर्या को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि यह हमारे दिमाग के गहरे जैविक ढांचे पर भी गहरा प्रहार करता है। ‘यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, लॉस एंजिलिस’ (UCLA Health) के शोधकर्ताओं ने हालिया अध्ययन में मस्तिष्क की कुछ विशेष कोशिकाओं और उनकी अत्यंत सूक्ष्म संरचनाओं में तनाव के कारण होने वाले परिवर्तनों की पहचान की है। प्रतिष्ठित शोध पत्रिका नेचर में प्रकाशित यह खोज भविष्य में चिंता (Anxiety) और अवसाद (Depression) जैसी गंभीर मानसिक जटिलताओं के इलाज के लिए एक नया क्षितिज खोल सकती है।
मानसिक स्वास्थ्य और तनाव से जुड़ी पारंपरिक रिसर्च में अब तक मुख्य रूप से मस्तिष्क के न्यूरॉन्स (Neurons) पर ही ध्यान केंद्रित किया जाता रहा है। हालांकि, इस नए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने एस्ट्रोसाइट्स (Astrocytes) नाम की ग्लियल कोशिकाओं (Glial Cells) की भूमिका पर प्रकाश डाला है।
एस्ट्रोसाइट्स मस्तिष्क की सहायक कोशिकाएं हैं, जो इसकी सामान्य कार्यप्रणाली को सुचारू बनाए रखने में प्राथमिक भूमिका निभाती हैं। शोधकर्ताओं ने मस्तिष्क के एमिग्डाला (Amygdala) हिस्से में स्थित एस्ट्रोसाइट्स का बारीकी से अध्ययन किया। एमिग्डाला हमारे मस्तिष्क का वह केंद्र है, जो भय, भावनाओं और तनाव की जैविक प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करता है।
शोध का सबसे दिलचस्प पहलू एस्ट्रोसाइट्स की सतह पर पाई जाने वाली एक अति-सूक्ष्म संरचना से जुड़ा है, जिसे प्राइमरी सिलियम (Primary Cilium) कहा जाता है। यह संरचना कोशिका के लिए एक छोटे एंटेना की तरह काम करती है, जो आसपास के रासायनिक व जैविक संकेतों को भांपकर कोशिका को प्रतिक्रिया देने में सक्षम बनाती है।
चूहों पर किए गए प्रयोगों से स्पष्ट हुआ कि दीर्घकालिक तनाव के संपर्क में आने से एमिग्डाला की एस्ट्रोसाइट्स में मौजूद यह सिलियम सिकुड़कर छोटा हो जाता है। सिलियम के आकार में आए इस संकुचन के साथ ही कोशिकाओं के जीन अभिव्यक्ति (Gene Expression) और प्रोटीन स्तरों में भी नकारात्मक बदलाव दर्ज किए गए।
वैज्ञानिकों ने यह जानने का प्रयास किया कि क्या इस छोटे हो चुके सिलियम को पुनर्जीवित कर तनाव के प्रभावों को पलटा जा सकता है। उन्होंने दो अलग-अलग वैज्ञानिक प्रणालियों का प्रयोग करते हुए जब सिलियम की संरचना को बहाल किया, तो परिणाम अत्यंत उत्साहजनक रहे:
आणविक सुधार: कोशिकाओं में तनाव के कारण पैदा हुए आणविक विकार काफी हद तक कम हो गए।
व्यवहार में बदलाव: चूहों में चिंता के लक्षण घट गए और उन गतिविधियों में उनकी रुचि पुनर्जीवित हो गई, जिनसे वे तनाव के कारण विमुख हो चुके थे।
इस शोध की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि S1PR1 नामक रिसेप्टर की पहचान है, जो एस्ट्रोसाइट्स में पाया जाता है। शोधकर्ताओं ने पाया कि इस रिसेप्टर को लक्षित करने से सिलियम की लंबाई और कार्यक्षमता पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है।
S1PR1 रिसेप्टर पहले से ही मल्टीपल स्केलेरोसिस (Multiple Sclerosis) के उपचार में उपयोग की जाने वाली स्वीकृत दवा पोनसिमोड (Ponesimod) का मुख्य लक्ष्य है। जब तनावग्रस्त चूहों को पोनसिमोड की खुराक दी गई, तो उनमें ठीक वैसे ही सुधारात्मक लक्षण देखे गए जैसे सिलियम को कृत्रिम रूप से ठीक करने पर मिले थे।
वैज्ञानिकों ने अपने शोध का दायरा केवल प्रयोगशाला के जानवरों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने गंभीर अवसाद (Major Depression), बाइपोलर डिसऑर्डर और अन्य मनोविकारी विकारों से ग्रस्त मृत व्यक्तियों के मस्तिष्क ऊतकों में जीन गतिविधि का अध्ययन किया।
इंसानी मस्तिष्क के नमूनों में भी एस्ट्रोसाइट्स के सिलियम से जुड़े जीनों में स्पष्ट परिवर्तन पाए गए। यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि यह सूक्ष्म तंत्र इंसानों के मानसिक स्वास्थ्य में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
यद्यपि इंसानी ऊतकों में इसके साक्ष्य मिले हैं, लेकिन वैज्ञानिक यह स्पष्ट करते हैं कि अभी यह निष्कर्ष शुरुआती स्तर पर हैं। चूहों पर सफल प्रयोग का अर्थ यह कतई नहीं है कि रातों-रात इंसानों के लिए सटीक दवा तैयार हो गई है।
फिर भी, यह खोज मानसिक रोगों को देखने के हमारे नजरिए को मौलिक रूप से बदलती है। तनाव का प्रभाव केवल सोच या न्यूरॉन्स तक सीमित नहीं है—मस्तिष्क की सहायक कोशिकाएं और उनके यह सूक्ष्म 'एंटेना' भी मानसिक आरोग्य के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। आने वाले वर्षों में, यदि मानव नैदानिक परीक्षण (Human Clinical Trials) सफल रहते हैं, तो ये सूक्ष्म संरचनाएं डिप्रेशन और एंग्जायटी के इलाज में एक नई क्रांति ला सकती हैं।